परिचय
आज जब हम किसी अपराधी को पकड़ने या अपने स्मार्टफोन को अनलॉक करने के लिए फिंगरप्रिंट (अंगुलियों के निशान) का उपयोग करते हैं, तो हमारे दिमाग में शायद ही कभी यह ख्याल आता है कि इस विश्वव्यापी तकनीक की नींव भारत में रखी गई थी। फिंगरप्रिंट वर्गीकरण की जिस प्रणाली को दुनिया 'हेनरी क्लासिफिकेशन सिस्टम' के नाम से जानती है, उसे असल में दो भारतीय मेधावी पुलिस अधिकारियों— काजी अजीजुल हक और हेमचंद्र बोस ने विकसित किया था।
19वीं सदी के अंत में, अपराध विज्ञान (Criminology) अभी शुरुआती दौर में था। उस समय अपराधियों की पहचान 'बर्टिलन सिस्टम' (शरीर की माप) से की जाती थी, जो काफी जटिल और त्रुटिपूर्ण थी। 1890 के दशक में, बंगाल के तत्कालीन पुलिस महानिरीक्षक एडवर्ड हेनरी ने फिंगरप्रिंटिंग में रुचि दिखाई। लेकिन उंगलियों के निशानों के हजारों कार्डों को एक व्यवस्थित तरीके से वर्गीकृत करना एक असंभव कार्य लग रहा था।
हेनरी ने इस कठिन गणितीय समस्या को सुलझाने के लिए दो युवा और प्रतिभाशाली भारतीयों को चुना: अजीजुल हक और हेमचंद्र बोस।
अजीजुल हक: वह गणितज्ञ जिसने 'वर्गीकरण' को जन्म दिया
प्रारंभिक जीवन
काजी अजीजुल हक का जन्म 1872 में अविभाजित बंगाल के खुलना जिले (अब बांग्लादेश) में हुआ था। बचपन में ही एक दुखद दुर्घटना में उन्होंने अपने माता-पिता को खो दिया था। बावजूद इसके, उनकी प्रतिभा में कोई कमी नहीं आई।
शिक्षा
हक एक असाधारण छात्र थे। उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा कलकत्ता के प्रतिष्ठित प्रेसिडेंसी कॉलेज से पूरी की। वहां उन्होंने गणित और सांख्यिकी (Statistics) में अपनी विशेष प्रतिभा दिखाई। उनकी गणितीय क्षमता ही वह मुख्य कारण थी जिसके कारण एडवर्ड हेनरी ने उन्हें फिंगरप्रिंट वर्गीकरण की जटिल गुत्थी सुलझाने के लिए चुना था।
कार्य
अजीजुल हक एक असाधारण गणितज्ञ थे। 1892 में, एडवर्ड हेनरी ने उन्हें फिंगरप्रिंट के रिकॉर्ड को व्यवस्थित करने के लिए एक गणितीय सूत्र खोजने का काम सौंपा। उस समय तक यह तो पता था कि हर इंसान के फिंगरप्रिंट अलग होते हैं, लेकिन समस्या यह थी कि लाखों निशानों में से किसी एक को खोजा कैसे जाए?
हक ने एक शानदार गणितीय वर्गीकरण प्रणाली (Mathematical Formula) विकसित की। उन्होंने उंगलियों के निशानों के चक्र (Whorls), लूप (Loops) और मेहराब (Arches) को संख्याओं में बदल दिया। उन्होंने 1,024 प्राथमिक वर्गीकरणों की एक प्रणाली बनाई। इस फॉर्मूले की मदद से, पुलिस अब मिनटों में अपराधी का रिकॉर्ड खोज सकती थी। हक की यह खोज फिंगरप्रिंट विज्ञान के इतिहास में 'मील का पत्थर' साबित हुई।
हेमचंद्र बोस: डेटा और मिलान के विशेषज्ञ
प्रारंभिक जीवन
हेमचंद्र बोस का जन्म बंगाल के नदिया जिले में हुआ था। वे एक कुलीन परिवार से ताल्लुक रखते थे और शुरू से ही कानून और व्यवस्था के प्रति समर्पित थे।
शिक्षा
बोस ने अपनी शिक्षा बंगाल में ही पूरी की और विज्ञान व कला विषयों में उनकी गहरी रुचि थी। वे केवल एक पुलिस अधिकारी नहीं थे, बल्कि रिकॉर्ड प्रबंधन और डेटा विश्लेषण के विशेषज्ञ भी थे। उनकी शिक्षा ने उन्हें फिंगरप्रिंट के सूक्ष्म मिलान (Microscopic analysis) के लिए आवश्यक धैर्य और दृष्टि प्रदान की।
कार्य
जहाँ हक ने गणितीय आधार तैयार किया, वहीं हेमचंद्र बोस ने इस प्रणाली को व्यावहारिक रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने फिंगरप्रिंट के मिलान के लिए 'टेलीग्राफिक कोड' और डेटा प्रबंधन की प्रणालियों पर काम किया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि हजारों रिकॉर्ड्स के बीच भी सटीकता बनी रहे। बोस ने बाद में फिंगरप्रिंट के आधार पर वर्गीकरण की कई उप-प्रणालियाँ भी विकसित कीं, जिनका उपयोग दशकों तक अपराधों को सुलझाने में किया गया।
श्रेय की चोरी और 'हेनरी' का नाम
विडंबना यह रही कि 1897 में जब इस प्रणाली को आधिकारिक रूप से अपनाया गया, तो एडवर्ड हेनरी ने इसका सारा श्रेय खुद ले लिया। इसे 'हेनरी क्लासिफिकेशन सिस्टम' कहा जाने लगा। अजीजुल हक और हेमचंद्र बोस के नाम को सरकारी दस्तावेजों की धूल भरी फाइलों में दबा दिया गया।
एडवर्ड हेनरी को उनकी इस 'उपलब्धि' के लिए ब्रिटेन में बड़े पद और सम्मान मिले, जबकि इस प्रणाली के वास्तविक वास्तुकार (Architects) पर्दे के पीछे ही रह गए।
दशकों बाद मिली पहचान
लंबे समय तक गुमनाम रहने के बाद, इतिहासकारों और शोधकर्ताओं ने रिकॉर्ड्स खंगाले। यह स्पष्ट हो गया कि हेनरी के पास वह गणितीय कौशल नहीं था जो इस प्रणाली को विकसित करने के लिए आवश्यक था। सारा काम हक और बोस ने ही किया था।
अंततः, ब्रिटिश सरकार ने भी उनके योगदान को स्वीकार किया। अजीजुल हक को 'खान बहादुर' और हेमचंद्र बोस को 'राय बहादुर' की उपाधि दी गई। हालांकि, आज भी दुनिया भर की किताबों में इसे 'हेनरी सिस्टम' ही पढ़ाया जाता है, जो इन दो भारतीयों के साथ एक ऐतिहासिक अन्याय है।
निष्कर्ष
अजीजुल हक और हेमचंद्र बोस केवल पुलिस अधिकारी नहीं थे, वे वैज्ञानिक और दूरदर्शी थे। उन्होंने आधुनिक फॉरेंसिक साइंस की दिशा बदल दी। आज जब हम डिजिटल सुरक्षा की बात करते हैं, तो हमें याद रखना चाहिए कि इसकी शुरुआत बंगाल के एक छोटे से ऑफिस में दो भारतीय दिमागों द्वारा की गई थी।
हमें अपने इन नायकों की कहानी को साझा करना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियाँ जान सकें कि दुनिया को सुरक्षित बनाने वाली सबसे बड़ी तकनीकों में से एक के पीछे भारतीय मेधा का हाथ था।